हिपोक्रेटिस की जीवनी.

हिपॉक्रेटीज को आधुनिक चिकित्सा शास्त्र का जनक कहा जाता है। इन्होंने रोग परीक्षण, निदान और उपचार की जिन पद्धतियों का प्रयोग किया उसी पर आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की नींव गढ़ी गई। डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी के बाद आज भी जो शपथ ली जाती है उसे हिपोक्रेटीज ओथ के नाम से जाना जाता है।

अनेक प्राचीन ग्रीस-ग्रंथों के द्वारा हम जो कुछ जान पाए हैं उसके अनसार ईसा से लगभग 460 वर्ष पूर्व यूनान के कॉस द्वीप में हिपॉक्रेटीज ने जन्म लिया था। एस्क्चूलेनियस का मंदिर इसी द्वीप पर स्थित था और सम्भवतः हिपॉक्रेटीज के पिता इसी मंदिर के पुरोहित थे।

प्रसिद्ध युनानी इतिहासज्ञ और दार्शनिक प्लेटो ने हिपॉक्रेटीज की चर्चा की है प्लेटो का कहना है कि हिपॉक्रेटीज ने दूर-दूर तक भ्रमण किया, जहां भी वे गए, उन्होंने चिकित्साशास्त्र की शिक्षा दी। थेलीज नामक यूनानी गणितज्ञ ने ईसा पूर्व छठी शताब्दी में कॉस द्वीप में जिस पाठशाला की स्थापना की थी वही सम्भवतः कालांतर में हिपॉक्रेटीज की शाला बन गई। चिकित्साशास्त्र के सिद्धांतों तथाचिकित्सक और रोगी के बीच समुचित व्यक्तिगत सम्बंधों की शिक्षा इस शाला में दी जाती थी!

हिपॉक्रेटीज के अभ्युदय-काल तक रोगों का निदान और उपचार एस्क्युलेपिअस के पुरोहितों के हाथों में था। एस्क्युलेपिअस ग्रीक और रोमन का आरोग्य-देवता था! पुराणों के आधार पर यह माना जाता है कि एस्क्युलेपिअस सिद्धहस्त चिकित्सक था। और उसमें मृतकों को जीवित कर देने की क्षमता थी।

उन दिनों बीमारी को देवताओं की अप्रसन्नता का परिणाम समझा जाता था, अतः रोग से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय था देवताओं को भेंट चढ़ाना। बीमार चल पाते तो एस्क्युलेपिअस के मंदिर तक पैदल जाते थे और पुरोहितों की मदद से देवताओं के कृपा-पात्र बनते थे। बहुतेरे रोगी शरीर के नीरोग होने की स्वाभाविक क्षमता के फलस्वरूप ही चंगे होकर घर लौटते थे। कभी-कभी मंदिर के पुरोहित मरहम या काढ़ा दे देते थे, यद्यपि इस इलाज का उन भाग्यशालियों के अच्छे होने न होने से कोई सम्बंध न होता था।

यह समझ लेना कठिन नहीं है कि लोग हिपॉक्रेटीज को संदेह की दृष्टि से देखते होंगे क्योंकि उन्होंने इस विश्वास को समाप्त कर दिया था कि देवताओं में मनुष्य को नीरोग करने की शक्ति होती है। फिर भी वे इतना चतुर तो थे ही कि देवताओं के प्रति लोगों की इस आस्था का पूरी तरह विरोध न करें। पहले हिपॉक्रेटीज की शपथ इस तरह थी-‘मैं चिकित्सक अपोलो, एस्क्युलेपिअस, आरोग्य संजीवनी तथा सभी देवताओं के नाम पर शपथ लेता हूँ। किंतु हिपॉक्रेटीज की आस्था प्रत्यक्ष और परीक्षित तथ्यों पर ही थी। रोग और निदान के सम्बंध में प्रचलित अंधविश्वास पर विजय पाने की उन्होंने पूरी कोशिश की।

सारे सभ्य संसार में हिपॉक्रेटीज की योग्यता का झंडा फहराया। फारस के बादशाह आर्तजेकसिर्ज ने उसे अनंत सम्पदा इसलिए देनी चाही कि वह फारस की फौजों का विनाश करनवाली महामारी को रोक दे। उस समय फारस और ग्रीस के बीच युद्ध चल था, इस कारण हिपॉकटीज ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया कि देश के शत्रु की सहायता करना उनके सम्मान के अनुकूल नहीं है। इस घटना को प्रसिद्ध तेल चित्र में दर्शाया गया है जो पेरिस के मेडिकल स्कूल में लगा है। हिपॉक्रेटीज के विचार से चिकित्सा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग शरीर-विज्ञान (ऐनाटॉमी) है। परंतु आगे चलकर कुछ युगों तक शरीरतंत्र के अध्ययन की उपेक्षा होती रही और पंद्रहवीं सदी में वैसेलियस ने ही इसका पुनरुद्धार किया।

हिपॉक्रेटीज की शपथ में डॉक्टर और सर्जन दोनों का काम पृथकू कर दिया गया है। यथा-‘में चाकू नहीं चलाऊंगा यह काम विशेषज्ञों को सौंपूगा।’ हिपॉक्रेटीज के मतानुसार सर्जन का पद डॉक्टर के पद से ऊचा है। जैसा कि हम आज भी मानते हैं। हिपॉक्रेटीज आधुनिक चिकित्साशास्त्र के जनक हैं। रोगों के कारणों को आसपास ढूंढ़ना ही वे श्रेयष्कर समझते थे न कि देवताओं के प्रकोप में। उनकी शिक्षा यही थी कि चिकित्सक रोगी को ध्यानपूर्वक देखे, उसकी परीक्षा करे और रोग के लक्षणों को लिख डाले। इस तरह वह एक ऐसा लेखा तैयार कर सकता है, जिसके आधार पर यह निश्चित किया जा सके कि रोगी का इलाज किस ढंग से करने पर वह नीरोग हो सकेगा। रोगियों की परीक्षा के लिए उन्होंने कुछ सामान्य नियम निश्चित किए—रोगी की आंखों की त्वचा का रंग कैसा है, शरीर का ताप कितना है, भूख लगती है या नहीं, पेशाब और पाखाना नियमित होता है या नहीं।

हिपॉक्रेटीज रोगी के सम्बंध में दैनिक विवरण तैयार करते थे और ऐसा करने के लिए जोर भी देते थे। वह रोगी की प्रगति से सम्बन्धित एक चार्ट भी बनाते थे। उन्हें इस बात का ज्ञान था कि जलवायु और ऋतु-परिवर्तन का विभिन्न रोगों पर क्या असर होता है। उदाहरणार्थ, जुकाम हमें सर्दियों में ही अधिक होता है। इस तथ्य की ओर ध्यान देते हुए हिपॉक्रेटीज को एक अन्य बात सूझी कि ज्योतिर्विज्ञान तथा चिकित्साशास्त्र में कुछ-न-कुछ गूढ़ सम्बंध अवश्य होना चाहिए क्योंकि ज्योतिर्विज्ञान विभिन्न ऋतुओं के सम्बंध में निश्चय करने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

इस सूझ का परिणाम यह हुआ कि आयुर्वेद के विद्यार्थी बिना किसी उपयुक्त कारण के सदियों तक ज्योतिर्विज्ञान का अध्ययन करते रहे। वे चिकित्सक की सामाजिक मर्यादा और उसमें सामान्य जनता की आस्था पर बहुत जोर देते थे। वह डॉक्टरों को प्रायः यह सलाह दिया करते थे कि वे रोगियों को यह बताने में कभी न हिचकिचाएं कि बीमारी कब तक चलेगी क्योंकि यदि उनकी यह भविष्यवाणी सही उतरी तो लोग उन पर आधकाधिक विश्वास करेंगे और उपचार के लिए अपने-आप को निःसंकोच सौप देंगे। हिपॉक्रटीज के कुछ अनुभव आधुनिकतम् प्रतीत होते हैं, जैसे—आमतौर से दुबले-पतले आदमी खुराक को घटा सकते हैं, लेकिन उसमें चर्बी का अंश कम नही होना चाहिए तथा मोटे आदमी खुराक को बढ़ा सकते हैं, लेकिन उसमें चबी का अंश कम होना चाहिए। चिंता, थकावट और सर्दी के कारण होने वाली शारीरिक व्याधियां को पानी और शराब की बराबर मात्रा लेने से दूर किया जा सकता है।


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