विलियम हार्वे की शिक्षा के बारे में चर्चा करिए!

विलियम हार्वे का जन्म इंग्लैंड के फोकस्टोन शहर में 1578 ई. की पहली अप्रैल को हुआ था। उनके पिता का नाम था टामस हार्वे, जो अपने समय के एक समृद्ध व्यापारी थे तथा अपने कस्बे का ऐल्डरमैन, और फिर मेयर भी रह चुके थे। विलियम के परिवार में सब मिलाकर दस बच्चे थे—तीन लड़कियां, और सात लड़के। परिवार में समृद्धि थी, स्वस्थरता थी और खुशहाली थी।

अब उनकी रुचि इस प्रश्न के समाधान में जाग उठी कि रक्त का कितना परिमाण इन धमनियों के माध्यम से शरीर में पहुंचता है। यह अनुमान करके कि प्रत्येक स्पन्दन में हृदय से दो औंस रक्त का गमनागमन होता है, और एक मिनट में वह 72 स्पंदन करता है, बड़ी जल्दी ही उसने यह गणना कर ली कि हृदय एक मिनट में एक गैलन से ज्यादा या–शायद विश्वास न आ सके–दिन में 1,500 गैलन से ज्यादा खून जिस्म में पम्प करता है। हार्वे के मन में स्वभावतः यह कुतूहल उठा कि यह हो कैसे सकता है। और अपने प्रश्न का आप उत्तर देते हुए वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ऐसा तभी सम्भव है जब कि रक्त का प्रवाह हृदय से ही आरम्भ हो और, सारे शरीर से घूमघाम कर फिर से हृदय में ही वापस लौट आए, अर्थात रक्त-संचार का मार्ग एक ‘परिक्रमा का मार्ग’ ही होना चाहिए!हार्वे ने शरीर-रचना की पुनः परीक्षा की, और कुछ परीक्षण और भी किए। शिराओं और धमनियों का, नीली और लाल नसों का, बड़ी सूक्ष्मता के साथ अध्ययन किया और पाया कि उनमें खून के बहने की दिशा हमेशा एक ही रहती है। दोनों में ही एक तरह का कुछ वाल्वों की-सी शक्ल का, एकाधिक द्वार, परदा-सा लगा होता है जो धमनियों में तो रक्त को हृदय से बाहर ही प्रवाहित होने देता है, और शिराओं में हृदय की ओर ही। इन एकमुखी द्वारों की उपयोगिता भी उन्होंने पशुओं के हृदयों पर परीक्षण करके प्रत्यक्ष प्रमाणित कर दी।

एक शिरा को खोलकर उसमें उन्होंने लम्बी पतली-सी एक सलाख डाल दी। यह सलाख बड़े आराम के साथ दिल की ओर तो चलती गई किंतु विपरीत दिशा में उसकी यह गति एकदम अवरुद्ध हो गई, क्योंकि-बीच में वाल्वों ने जैसे अपने दरवाजे बंद कर लिए थे। फिर परीक्षण किए गए और फिर परीक्षण किए गए कि कहीं कुछ गलती रह गई हो। और तब कहीं जाकर, रक्त के संचार का सही चित्र उपस्थित हो सका कि हृदय से निकलकर, धमनियों के मार्ग से प्रवृत्त होता हुआ और शिराओं के मार्ग से प्रत्यावृत्त हुआ, खन फिर से दिल में ही वापस आ जाता है। शरीर में रक्त-संचार का प्रथम अंवेषण 78 पृष्ठ का एक निबंध के रूप में 1628 में प्रकाशित हुआ।शीर्षक था ‘पशुओं में हृदय तथा रक्त की गतिविधि के सम्बंध में तात्त्विक विश्लेषण।’ इसके द्वारा वह विज्ञान के क्षेत्र के एक बड़े बद्धमूल अंधविश्वास को उखाड़ फेंकने में सफल रहे थे। इसके बाद से प्राणियों के शारीरिक कार्यों के सम्बंध में हमारा ज्ञान बहुत ही अधिक स्थिरता के साथ निरंतर आगे ही आगे बढ़ता आया है।


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