ओटोवान ग्वेरिक जी की जीवन शिक्षा!

ओटोवान ग्वेरिक का जन्म एक धनी-मानी परिवार में हुआ था। इनकी शिक्षा-दिक्षा लिपजिग (Lipzig) विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुई। सन् 1621 में जेना विश्वविद्यालय में इन्होंने कानून का अध्ययन किया और सन् 1623 में लीडन विश्वविद्यालय में गणित और यांत्रिकी का अध्ययन किया। सन् 1631 में वे स्वीडन के गुस्तावस-11 (Gustavus-11) की सेना में इंजीनियर नियुक्त हुए!

ग्वेरिके एक प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री, इंजीनियर और दार्शनिक थे। इन्होंने वायुपम्प का आविष्कार किया। इस पम्प की सहायता से उन्होंने निर्वात (Vacuum) तथा जल में और सांस लेने में वायु के महत्त्व का अध्ययन किया। सन् 1646 से 1681 तक वे मगडेवर्ग के मेयर पद पर और ब्रेन्डनबर्ग के मजिस्ट्रेट पद पर आसीन रहे।ओटोवान ग्वेरिक के मेयर बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। सन् 1618 में जर्मनी में एक भयंकर युद्ध छिड़ गया, यह युद्ध लगभग 30 वर्षों तक चला।
ओटोवान ग्वेरिक ने इस युद्ध में अपना बहुत योगदान दिया। वे गणित तथा यांत्रिकी के कुशल इंजीनियर बन गए। संयोगवश युद्ध में उनके पक्ष की पराजय हो गई। शत्रु ने मगडेवर्ग पर कब्जा कर लिया और नगर को बुरी तरह नष्ट कर दिया। इस युद्ध में लगभग 30,000 व्यक्ति मारे गए। सौभाग्यवश ग्वेरिक के मौत से बच गए। बाद में उन्होंने नगर का पुनर्निर्माण करने में बहुत मदद की और उन्हें नगर का मेयर बना दिया गया। इस पद को वे 35 वर्षों तक सम्भाले रहे। मेयर के जिम्मेदार पद पर होने के नाते वे बहुत ही व्यस्त रहते थे। लेकिन विशेष रुचि होने के कारण वे वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए कुछ न कुछ समय निकाल ही लेते थे!

अपने विभिन्न प्रयोगों के दौरान सन् 1663 में इन्होंने एक ऐसा जनरेटर बनाया, जो स्थिर विद्युत पैदा करता था। यह जनरेटर गंधक से बनाया गया था, जिसे घुमाने पर घर्षण द्वारा विद्युत पैदा होती थी। कई वर्षों बाद सन् 1672 में ग्वेरिके ने इस बात का पता लगाया कि गंधक की गेंद पर पैदा होने वाली विद्युत उसकी सतह पर एक चमक पैदा करती है। यह चमक विद्युत प्रतिदीप्ति (Electro Luminescene) कहलाती है। इस प्रकार ग्वेरिके पहले व्यक्ति थे जिन्होंने विद्युत प्रतिदीप्ति को देखा! बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस वैज्ञानिक ने खगोलशास्त्र (अंतरिक्ष विज्ञान) का भी अध्ययन किया और बताया कि धूमकेतु (Comets) नियमित रूप से अंतरिक्ष में अपने स्थान की ओर वापस आते हैं। जब वे अस्सी वर्ष के थे तो पदमुक्त होकर वे हेमबर्ग में वापिस चले गए और वहीं सन् 1686 में इस महान वैज्ञानिक का देहांत हो गया!


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